कुंडलीग्राम का जन्म एक संस्थापक के जीवन के एक कठिन दौर से हुआ। कुछ समय पहले एक ऐसा समय था जब वह ऐसे प्रश्नों के साथ बैठी थी जिनका कोई आसान उत्तर नहीं था। मेहनत सच्ची थी, नीयत साफ़ थी, फिर भी कुछ चीज़ें बस सही जगह नहीं बैठ रही थीं, और वह समझ नहीं पा रही थी कि क्यों।
लोगों ने सलाह दी। नेक सलाह। और मेहनत करो। धैर्य रखो। सब ठीक हो जाएगा। पर इनमें से किसी ने भी उस कठिनाई की ख़ास बनावट को नहीं समझाया। ये ख़ास बाधाएँ क्यों, यही समय क्यों, और यह एहसास क्यों कि कुछ बड़ा चल रहा है।
तो उसने अपनी कुंडली की ओर रुख़ किया। पहली बार नहीं, पर पहली बार गंभीरता से, एक ओर वैदिक ग्रंथ खुले थे और दूसरी ओर उसकी जन्मकुंडली, दशाओं को पढ़ते हुए, भाव स्थितियों को समझते हुए, यह जानते हुए कि प्राचीन परंपरा उस दौर के बारे में वास्तव में क्या कहती है।
और कुछ बदला। परिस्थितियाँ नहीं, तुरंत नहीं, पर उन्हें समझने का नज़रिया बदला। अचानक कठिनाई की एक आकृति बन गई। समय का एक तर्क दिखा। जो पैटर्न बेतरतीब और निर्मम लगते थे, वे किसी उद्देश्य से भरे हुए प्रतीत हुए। वही परंपरा जिसने सदियों तक भारतीय परिवारों का मार्गदर्शन किया था, चुपचाप और सटीकता से उसके जीवन का वर्णन कर रही थी।
उसने सोचना शुरू किया कि और कितने लोग वैसे ही अनुत्तरित प्रश्नों के साथ बैठे होंगे, कठिन दौर से गुज़रते हुए, पर उसे समझने की भाषा के बिना, कहीं बनी और भुला दी गई एक कुंडली को थामे, जिसमें वे उत्तर हैं जिन तक वे कभी पहुँच ही नहीं पाए। कुंडलीग्राम उसी प्रश्न का उत्तर है।